Saturday, 14 January 2023

पानिपत काव्य

प्रलयलोटला सागर उठला 
खणाणल्या समशेरी
महाभारतासम रण दिसले
कुरुक्षेत्राची भुमी
भाऊ सदाशिव रणात तांडव
काळाग्निसम करीत भिडले
शिंद्याचे रण भैरव कंदन 
म्लेंच्छावर जणु तुफान उठले 
यौवन शोर्या गाजवित तो
सुर्य मंडळा भेदत पडले
अभिमन्यू विश्वास जनकोजी 
मृत्यू ला ही मारत लढले
देश रक्षणा मर्हाट भाला
पठाण छेदून तुटून गेला 
भारत भूमी साठी मराठा
शंभर कापत कटून गेला 
पानिपत ते एकच काय
अशा आहुत्या लक्ष करु
हरलो जरी हि रणांगणी

बाजी राधाकृष्ण पांडव copyright 

Thursday, 6 January 2022

चुकूर होऊ नका

चुकूर होऊ नका, गड्यानो, चुकूर होऊ नका 
स्वराज कार्या मधे, कुणी ही, फितूर होऊ नका 

इमान ठेवा भगव्या पायी ,एकीच आपली ताकत हाई 
शिवाजी राजा सांगून जाई भाव भेद हा फुका 

भाव भेद हा फुका गड्यांनो चुकूर होऊ नका

रगात सांडू धर्मासाठी आयुष्य वाहू देशासाठी 
शंभू राजाच्या स्वप्नासाठी स्वार्थी होऊ नका

स्वार्थी होऊ नका गड्यांनो चुकूर होऊ नका


बाजी राधाकृष्णन्

Monday, 27 December 2021

शिवराज अष्टक

हिंदु शौर्य तेज अंभ  शिऽव राज भूपती
कोटि सुर्य कोटी चंद्र क्षात्र तेज नृपती 
क्रूर काळ दंड धारि शिऽव म्लेंच्छ मारका
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

पारतंत्र अंधकार अंतकाल शिव रवी 
आफजल्ल उदर विदर शिवसिंह नरहरी
बुद्धि थोर शौर्यघोर हिंदु राज्य स्थापका
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

सह्य सिंह दख्खणेंद्र दूर्ग प्रिय रायरी
अश्व कटक भूवरी अजेय सिंधु सागरी
शाम श्वेत म्लेंच्छ दुष्ट क्रूर शत्रु मर्दका 
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

किर्तिवंत या अनंत खंड मंडलांतरी
शिव राज किर्तिवंत एक ची दिगंतरी 
गुंड पुंड लक्ष झूंड न्याय धाक दंडका
देव देश धर्म पाल शिऽव युऽग नायका 

साधू संत भाट ब्रह्म वृंद ज्यास वंदिती
रुद्र शत्रु रयत राम शिव राज बोलती
कर्ण धर्म भीम पार्थ गुण समुच्च नायका
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

मातृभक्त भक्तिसिंधु पितृशौर्य गर्वि तो
मां भवानि भक्त स्त्रीस मातृतुल्य लेखतो
मां भवानि मातृभक्त मातृभूमि पूजका 
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

निर्बलास मित्र हस्त लोक प्रिय प्रियसा
दीन मित्र गर्व रिक्त लोक राज राजसा
लोक रक्षणार्थ छत्र राज चिन्ह धारका
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

सुस्त राष्ट्र जागृतार्थ शिव राय मंत्र हा
शौर्य धैर्य स्फुर्तिदायि शिवशंभु मार्ग हा
भक्त बाजी सेव्य अर्पि काव्य पुष्प अष्टका
देव देश धर्म पाल शिऽव युग नायका 

कवि-बाजी राधाकृष्ण पांडव copyright.
सर्व हक्क लेखकाधिन.

Thursday, 16 December 2021

मी कधी

मी कधी, तुझ्या सोबती , कधी गुंतलो ,कळे ना मला
तू कधी ,पुन्हा तू कधी,कधी भेटसी , मला सांग ना

आभास तू ,का जाहली , स्वप्नात माझ्या,तू ये ना जरा 
स्वप्नात तू,राहू नको ,कधी सोबती ,तू ये ना जरा
तू कशी,जशी चांदणी ,कधी रातीला ,तू ये ना जरा
मी तुझा,होऊ दे तुझा,मला गुंतू दे,तू ये ना जरा

तू कधी ,मनाला कधी,कधी गुंफले,कळे ना मला
का तुझी,मनाला तुझी,का ओढ लागे ,कळे ना मला
तू आता,मला सोबती ,सवे चालण्या, तू ये ना जरा
तू असा ,तो चंद्र जसा ,सवे चांदणीच्या तू ये ना जरा
तू असा,जसा श्वास हा ,हृदयात ये,तू ये ना जरा

Tuesday, 14 December 2021

मृत्युवरी स्वार

मृत्युवरी स्वार होतो मराठाच, मृत्युस मारीत जातो रणी 
धर्मात, युद्धात, शौर्यात धैर्यात जो अग्रणी तो मराठा धनी 

युद्वात आहे पुढे आपल्या कोण , पाहे मराठा न केव्हा तरी 
हा आत्मविश्वास ऐसाच नाही, काळास तुम्ही विचारा तरी
दूर्दांत गर्विष्ठ हरवून युद्धात गर्वास चेंदून
आम्ही करी

आम्हीच रोखून आक्रंत कारी, किती मारले गाडलेले रणी
मृत्युवरी स्वार होतो मराठाच, मृत्युस मारीत जातो रणी 


दिल्लीत गर्जून सिंहासनी श्री शिवाजी बनूनी आव्हानलो
औरंग अफजल्ल आलेत जे ही फाडून छातीवरी नाचलो 
खिंडीत बाजी बनूनी यमालाच शंभू बनूनी कधी भांडलो

दर्यासही धाक लावी मराठाच अटकेस जिंकून जातो क्षणी 
मृत्युवरी स्वार होतो मराठाच, मृत्युस मारीत जातो रणी 
 बाजी राधाकृष्ण पांडव copyright

Wednesday, 14 July 2021

रावण चरित्र

क्या आप मानते है कि रावण एक महान राजा था ?
क्या आपको लगता है कि रावण सर्व शक्तीशाली योद्धा था ? और उसको कौई हरा नही पाया था?
क्या आपको यह लगता है रावण ने अपने बहन कि शील मर्यादा कि वजह से माता सीता का हरण किया था ?
क्या आप समजते है कि रावण वैदिक सनातन धर्म का विरोधी और शत्रू था ?

तो अंत तक जरुर देखे  वाल्मिकी रामायण जो महर्षी वाल्मिकी ने श्री राम जी के समय मे लिखी थी   इसमे से हम जानेंगे लंका के राजा रावण के बारे मे

आईए जानते है रावण और उसके भाई बहनो का जन्म कैसे हूआ उसका कुल क्या था ?
तो वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड के नववे सर्ग मे लिखा है
  राक्षसो के राजा सुकेशके पुत्र सुमाली कि बेटी कैकसी थी उसने  सुपुत्र कि इच्छा हेतू भगवान विष्णू से उत्पन्न  ब्रह्मदेव के  पुत्र महर्षी पुलस्त्य के विश्रवा नामक अग्निहोत्री ब्राह्मण ऋषी के द्वार पर संध्या समय मे जब विश्रवा ऋषी अग्निहोत्र कर रहे अशुभ समय आकर खडी हूई और पुत्र प्राप्ती कि याचना कि महर्षी ने उसे बताया इस अशुभ समय कि वजह से तुम्हारे पुत्र अधर्मी राक्षस ही होंगे 
  तब कैकसी बहुत दु:खीत हुई और कहा मुझे तो आपके जैसा धर्मवान तेजस्वी पुत्र कि कामना थी महर्षी मुझ पर कृपा किजिए 
  तब महर्षी ने तपोबल से आशिर्वाद दे कर कहा तुम्हारा एक पुत्र मेरे जैसा धर्मवान तेजस्वी होगा बाकी अधर्मी राक्षस ही होंगे .
  और रावण ,कुंभकर्ण , शुर्पनखाऔर विभिषण का जन्म हुआ था
जन्मतः रावण के दस सीर बीस भूजा विशाल मुख और रंग कोयले सा काला था तब उसके पिता ने उसका नाम दशग्रीव रख दिया था .

आईए अब जानते है रावण को सोने कि लंका कैसे मिली ? कैसे रावण एक शक्तीशाली राक्षस बन गया ?
 वाल्मिकी रामायण नववे दसवे सर्ग मे लिखा है
रावण का एक और सौतेला भाई था जीसे हम धन कि देवता यक्ष राज कुबेर समजते है पहले वह सोने कि लंका नगरी मे रहता था  उसे देख कर कैकसी को ईर्ष्या हूई और उसने अपने पुत्रो से कुबेर जैसा बनने को कहा 
तब रावण और कुंभकर्ण ने दस हजार वर्ष  तपस्या कि और ब्रह्मदेव से वर स्वरुप
रावण ने मांगा कि 
मै गरुड नाग यक्ष देव दैत्य दानव और राक्षसो के लिए अवध्य हो जाऊ यानी ये सब मेरे मृत्यू का कारण नही हो सकते रावण मणुष्य को दूर्बल समझता था और 
ब्रह्म देव से यह वर प्राप्त कर रावण शक्ती शाली बन गया .

अब हम जान ते है रावण को लंका कैसे मिली ?
तो उत्तरकांड अकरावे सर्ग मे लिखा है कि रावण  ब्रह्म देव से वर प्राप्त कर उन्मत्त हो गया और उसने कुबेर के पास बार बार लंका छोडने के लिए संदेश भेज दिये फिर पिता विश्रवा कि आज्ञा से कुबेर ने लंका छोड दि और कैलाश के पास चले गये और वहा उसने अलकापूरी शहर बसाया .

क्या रावण सर्व शक्तिमान था ? क्या उसने सभी देवताओ और राजा ओ को जिता था ?
1. रावण सर्वशक्तीशाली नही था इसका प्रमाण वाल्मिकी रामायण मे उत्तरकांड आठवे सर्ग मे श्रीराम जी को अगस्त्य ऋषी बताते है आपने जिस पुलस्त्यवंशी राक्षसो को यानी रावण और बाकीयो को मारा उनसे जादा पराक्रमी उनके दादाजी सुमाली  और उसके भाई माल्यवान तथा माली थे यह इतने शक्तीशाली थे कि उनको रसातल भगाने स्वयं भगवान विष्णू को युद्ध करना पडा था .

रावण के कुबेर को जीतने के बाद कैलास पर आक्रमण करणे गया था तब उपर बैठे शिव पार्वती डराने हेतू उसने कैलास को अपनी भूजाओ से हिलाने लगा तब शिव जी ने कैलाश मात्र पैर के अंगूठे से दबा दिया जिस वजह से रावण हजार वर्ष कैलाश के नीचे दबा रहा था फिर जब रावण ने रावण के मंत्रीयो के अनुरोध से शिव कि प्रार्थना रावण ने  यह जान लिजिए कि सामवेद के मंत्र और विभिन्न स्तोत्रो से कि थी तब भगवान शंकर प्रसन्न हूए और दशग्रीव का नामकरण तब से रावण कर दिया  मतलब जीसने पर्वत के नीचे दबकर भयंकर आर्तनाद अर्थात राव किया था वह रावण .
भगवान शिव ने उस वक्त चंद्रहास नामक तलवार रावण को दि थी .

जब रावण ने यम लोक पर आक्रमण किया था तब यमराज ने छोडे हूए यमपाश से रावण कि रक्षा स्वयम् ब्रह्मदेव ने आकर कि और यमराज को पराजय स्विकारणे विवश किया था .

रावण  ने जब देवलोक पर आक्रमण किया था तब इंद्रादी वसू रुद्र मरुत गणो ने रावण घेर कर पकड लिया था तब रावण के पुत्र मेघनाद ने इंद्र को माया और छल के सहारे जीतकर बंदी बना लिया और रावण को बचाया था .

जब जब रावण पृथ्वी पर विजय करता घूम रहा था उस वक्त एक दिन वह हैहय वंशी क्षत्रियोसे रक्षित महिष्मती नगर मे जा कर वहा के राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन से उलझा तब कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन ने रावण को परास्त कर दिया और महिष्मती नगरी मे कैद कर लिया तब रावण के दादाजी महर्षी पुलस्त्य ने कार्तवीर्य से रावण को छूडा लिया

जब रावण अर्जुन से छुटकारा पाकर किष्किंधा नगरी में जाकर पहुंचा और वहां के राजा वानर राज वाली को ललकार ने लगा तब सुग्रीव ने रावण से कहा की वाली अभी चारों समुद्रों से संध्या उपासना करके आते ही होंगे तुम तब तक ठहर जाओ अब रावण से रहा नहीं गया और वह पुष्पक विमान से दक्षिण समुद्र के तट पर चला गया जहां पर वाली बैठकर संध्या उपासना कर रहा था तब रावण ने बाली को पीछे से पकड़ने का विचार किया मगर महाबली वाली ने रावण को बगल में दबोच लिया और एक से दूसरे ऐसे चारो दिशा के समुद्र के तट पर छलांग लगाकर संध्या उपासना करते हुए फिर किष्किंधा में लाकर पटक दिया था इस प्रकार वाली ने रावण को हरा दिया था
यमलोक को जीतकर रसातल में दिग्विजय हेतु गया तब उसका सामना मणिमय पुरी के निवातकवच  से हुआ वे सब बलशाली थे उनसे युद्ध करते हुए 1 वर्ष बीत गया मगर कोई भी नहीं जीत पाया तब भगवान ब्रह्मा देव ने संधि कर रावण को उनसे दोस्ती करने की सलाह दी और रावण वहां से चला गया
वास्तविक रावण वरदान के कारण उन्मत्त हो चुका था मगर उसके कायर भी था उदाहरण के तौर पर देखें तो खुद को विश्वविजयी कहने वाला रावण सीता हरण करने के लिए अपने भाई मारीच की मदद से राम और लक्ष्मण को सीता से दूर कर सीता को हर लेता है यहां पर रावण की वास्तविक कायरता का दर्शन होता है मंदोदरी युद्वकांड मे रावण के मृत्यूपरांत रावण से कहती कि आपने यह कायरता कैसे कि  
  वस्तुतः रावण ने पहले देवता आदिती कन्याए और अनेक राजकन्याओं तपस्विनीओ का बलपूर्वक हरण किया था मगर सीता हरण करने के लिए ही उसने छल का सहारा लिया था

इस प्रमाणों से सिद्ध होता है कि रावण न हीं संपूर्ण  विश्व विजयी था और ना ही सर्वश्रेष्ठ योद्धा वह मात्र वरदान के कारण प्रबल हुआ था

आईए अब रावण कि अधार्मिकता और उन्मत्तता को देखते है 

रावण जन्म से अत्याचारी और नरभक्षक था वह ऋषि मुनि और मनुष्य को मारते और खाते फिरता था उत्तरकांड अठरावे सर्ग मे लिखा है कि रावण ने मरुत राजा के यज्ञ के सभी पुरोहितों और ऋषि यों को खा लिया था रावण की संस्कार हीनता उसके कुबेर के दूत कि हत्या करने के और हनुमान को मारने के प्रयास से हम देख सकते हैं की रावण राज नियोजित शिष्टाचार का पालन करना नहीं जानता था

उत्तरकांड सोलावे सर्ग के अनुसार  जब रावण का पुष्पक  विमान कैलाश पर चढ नहीं पाया तब रावण को समझाने आए हुए नंदीश्वर के रुप का रावण ने उपहास किया था और भगवान शंकर का अपमान किया था तब  नंदीश्वर ने कुपित होकर रावण को श्राप दिया की तुम्हारा और तुम्हारे कुल का विनाश का कारण वानर बनेंगे  

उत्तरकांड उन्नीस वे सर्ग के अनुसार जब इक्ष्वाकु वंश के राजा अनरण्य से रावण युद्ध कर रहा था तब रावण ने इक्ष्वाकु वंश का अपमान किया था तब राजा अनरण्य ने रावण को शाप दिया था की रावण के कुल का संहार करने वाला मेरे ही इक्ष्वाकू कुल में उत्पन्न होगा .



जो लोग कहते हैं कि रावण ने अपनी बहन का बदला लेने के लिए सीता का हरण किया था, वे रामायण नहीं पढे हैं। उत्तरकांड के अनुसार  वास्तविक रावण ने शुर्पनखा के पती विद्यूजिव्हा कि रसातल मे युद्ध के उन्माद मे हत्या कर डाली थी रावण कि कामुकता सीता को लेने के लिए थी और यह बात शुर्पनखा भी जानती थी इसी वजह से रावण के पास जाकर उसने उत्तरकांड चौतीसवे सर्ग श्लोक 15-22 के अनुसार सीता कि सुंदरता का वर्णन करते हुए कहती है उसके रुप की समानता करनेवाली भूमण्डल मे दूसरी कोई स्त्री नही है वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और केवल तुम ही उसके योग्य हो 
उस सीता को जब मै तुम्हारे लिए लाने गई तो  तब लक्ष्मण ने मुझे इस तरह कुरुप कर दिया  

कुछ लोग कहते है रावण ने सीता मा का हरन तो किया मगर उनके साथ कुकर्म नही किया था इस वजह से रावण को वह सत्शील कहतै है मगर इन लोगो ने वाल्मिकी रामायण नही पढा हूआ 
 रावण के पुर्वायुष्य मे किये गये कुकर्म देखने पर समझ आ जाता है रावण चरित्र कि दृष्टी से कितना गीर चूका था 
रावण के लिए बलात्कार करना मानो खेल 
था 
युद्धकांड तेरवा सर्ग मे रावण को जब सीता माता पर बलात्कार करने महापार्श्व उकसाता है तब रावण उससे कहता है की एकबार पुंजिकस्थला अप्सरा जो ब्रह्मलोक जा रही थी तब उसका रावण ने बलात्कार किया था तब ब्रह्मदेव ने रावण को यह शाप दिया था कि अगर इसके बाद रावण किसी स्त्री से उसके इच्छा के विरुद्ध बलात्कार करेगा तो उसके मस्तक के सौ तुकडे हो जाएंगे 
उत्तरकांड के छब्बीस वे सर्ग मे लिखा है कि 
एक बार स्वर्ग की अप्सरा रंभा रावण के भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने जा रही थी। रास्ते में रावण ने उसे देखा और वह रंभा के रूप और सौंदर्य को देखकर मोहित हो गया। रावण ने रंभा को बुरी नीयत से रोक लिया। इस पर रंभा ने रावण से उसे छोडऩे की प्रार्थना की और कहा कि आज मैंने आपके भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने का वचन दिया है अत: मैं आपकी पुत्रवधु के समान हूं अत: मुझे छोड़ दीजिए। परंतु रावण था ही दुराचारी वह नहीं माना और रंभा के साथ बलात्कार कर लिया।

रावण द्वारा रंभा पर बलात्कार का समाचार जब कुबेर देव के पुत्र नलकुबेर को प्राप्त हुआ तो वह रावण पर अति क्रोधित हुआ। क्रोध वश नलकुबेर ने रावण को श्राप दे दिया कि यदि वह कामपिडित होकर उसे न चाहनेवाली स्त्री से बलात्कार करेगा तो उसके मस्तक के सात तुकडे हो जाएंगे

रावण जब हिमालय के वन मे घूम रहा था तब  उसने तपस्विनी वेदवती को देखा वह बहुत सुंदर थी अत: रावण कामुक हुआ और उसने वेदवती से प्रणय याचना कि मगर वेदवती ने कहा कि वह भगवान नारायण को अपना पती मान चूकी है तब रावण ने बल पूर्वक उसके बालो को पकड लिया फिर क्रोधित वेदवतीने बाल काट दिए और अग्नि मे समा गई और शाप दिया कि रावण के मृत्यू का कारण बनने वह फिर जन्म लेगी .

और भी बहुत से पर स्त्री गमन के पृथक पृथक उदाहरण हमे मिलते है मगर उपरोक्त मैने जैसे कहा है वाल्मिकी रामायण को अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है तो मैने प्रयासपूर्वक रावण का पूर्ण चरित्र यहा रखने का प्रयास कर दिया है .उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आयी हो 
बाजी ©

Friday, 11 June 2021

संताजी घोरपडे कविता

संताजी आले सैन्य वीजेसम, उसळून गेले मराठमोळे
मुगली छावणी पडली उताणी , औरंगजेब धरेवर लोळे

संताजी आया आया देखो , म्हणे क्रूर शैतान वो
उडती धडे अन कटे मुंडकी ,भैरव या वेताळ हो
अंधकारमय आसमंती तलवार ‍, भासते सुर्य जणु 
अंधकार रुपी मुगलांना तलवार ,  घोरपडी काल जणु

संताजी आले सैन्य वीजेसम उसळून गेले मराठमोळे
मुगली छावणी पडली उताणी औरंगजेब धरेवर लोळे

म्हणे संताजी 

अरे भेकडा शहा औरंग्या , जनानखाना सोडून ये  
तलवार घेऊनी लढण्या ये , वा साडी घाल नाचण्यास ये 
खांडोळी खांडोळी करतो , कात्रजचा तुज घाट दावतो
शिवरायांचे तेज दावतो , मर्हाटी क्षात्रतेज दावतो

बाजी पांडव © कवितेचे सर्वाधिकार रक्षित.

Tuesday, 1 June 2021

अर्जून का मनोगत

सुनो कर्ण तुम, अर्जुन मैं; कुछ़ बाते बताने आया हूँ,
जीवन कि मेरी दुविधा मैं ,कुछ़ तुमसे बांट़ने आया हूँ।

खो कर तुमको मिले माँ पिता , मुझे जन्म से पिता नहीं, 
राजवंश मे जन्म हूआ पर , कभी वनवास चूका नहीं।

तुमने बचपन बीता दिया , माँ पिता संग यारों के,
मुझ को शत्रू मिले जन्म से , आप्त मिले विष प्यालों से।

कवच दिया था तुम्हे पिता ने , और तेज भी वैसा ही,
मुझ को मिल गये गुरु द्रोण बस , बाकी सब कुछ़ वैसा ही।

तुम को परायों ने अपमाना , दाह उसका भी बहूत हुआ 
अपनो ने जलाया लाक्षागृह मे ,  उसका दाह क्या कभी गया?

तुमको पता है दुख पत्नी को ‍, बाँट़ने पर क्या होता है, 
बस सोचकर देखो कर्ण स्वयं , मन कितना हिल जाता है। 

बृहन्नला बन नृत्य करना , क्या वीर को शोभा देता है,
कर शस्त्राभूषणे त्याग पहनना , चूडी भारी होता है।

संघर्ष किया है तुमने अपने , हक  के लिए परायो से, 
मुझको मारने पडे स्वजन भी ‍, हक के लिए सियारो से। 

राह दिखाई कृष्ण ने मुझे और , तुम्हे भी याद करो, 
धर्म मार्ग को चुना था मैंने और , तुमने अंधियारों को।

दानवीर अगर शब्द कहूँ तो कर्ण ही तो मैं कहता हूँ,
अधर्म पथ पर धर्म कर्ण ही सुर्यपुत्र मैं कहता हूँ। 

याद करो तुम कर्ण जिस दिन, स्वयंवर से भागे थे 
याद करो तुम चित्रसेन से मार खा कर भागे थे

विराट नगरी मे भाई को मरते छोडकर भाग गये 
सैन्य सहित तुम जान बचाकर दोनो बार भाग गए

कर्ण मारने मुझे कपट की आवश्यकता जरा नही थी
कर्म किये थे तुमने जो भी  सजा ही उसकी पाई थी

अधर्म किया था तुमने द्रौपदी , को वेश्या कहलाकर,
अधर्म किया था तुमने निहत्थे ‍, अभिमन्यु को मार गिरा कर।

अधर्मी दूर्योधन को तुमने , क्या धर्म का मार्ग बताया ?
विनाशकी जो बन जाए वह , क्या सच्चा मित कहलाया?

अगर धर्म भी अधर्म पथ़ पर , मार्गक्रमण जब करता है,
अधर्म डूबता अंधकार मे , दिनकर जैसे डूबता है।

धर्म मार्ग पर चले जो वही धर्मवान कहलाता है
अधर्म चुन ले तो ईश्वर भी असुर यहा कहलाता है 

Baaji©

Tuesday, 8 December 2020

आदत हो गई है

बेहाल यू मुस्कुराने कि हमे आदत हो गई है
जैसी भी है जिंदगी जीने कि आदत हो गई है

क्यू करते है कोशीश हमे गिराने कि लोग
हमे गिरगिर कर उठने कि आदत हो गई है

अब यू ही लिखकर छोड देते है दिल कि बाते
हमे भी पलटकर न देखने कि आदत हो गई है

यू बताओ  खयाल किसे नही आते हरवक्त
हमे भी खयालो मे जीने कि आदत हो गई है

बाजी© 

Monday, 30 November 2020

बाजीराव

शिवरायांचे शिष्य मराठे कावा आपले अस्त्र 
मरुतावरती स्वार मराठी वेग आपले शस्त्र
आज हवे तर पृथ्वी स्वामीच्या चरणी आणून मांडू
दिशा दाखवा निजाम काय तो इंद्राशी ही भांडू

आदेश द्याल तर रक्तहीनसा विजय करुन येऊ
राऊ वदले "महाराज पालखेडी निजाम गाडून येऊ ? "

घोडा आपले शिबिर समजा हुरडा आपला पेढा 
राती नसती झोपण्यास संधीच ती गनिम वेढा
मर्हाटभाई करु चढाई एक होऊनी जिंकू लढाई 
खेचून आणू दिल्लीपती ला शाहू छत्रपती पायी

दिल्लीपती ची रणशिंगाने झोप उडवूनी येऊ
राऊ वदले "चला मल्हारराव दिल्ली जिंकूनी येऊ" !

छत्रपतींचे स्वप्न केशरी झोपू देईना काही 
सोडवायची काशी मथुरा यमुना गंगामाई
इंग्रज हबशी पोर्तुगीजाची उडवू राई राई
हिंदू पद पातशाहीला उशीर आता नाही 

पोर्तुगीजांना रणयज्ञाचे चटके देऊन येऊ 
राऊ वदले अप्पा वसई भगवी करुनी येऊ

बाजी©

Saturday, 28 November 2020

तान्हाजी

शतकाच्या त्या ,गुलामगीरीचा ,वचपा चल काढू
तान्हाजी गरजला , कडा चढूनीया,भगवा वर गाडू

संकटे विकट जरी वाट बिकट ही जात तिखट रांगडी
एक साथ करु आघात अरी निःपात करुत या घडी
लावूया बाजी राजं शिवाजी आपला गाजी शंभू अवतार 
स्वप्न साकार करण्या कर वार भरा हूंकार शंभो हर हर 

 चला शत्रूच्या पदरी मृत्युचे दान आता वाढू
 तान्हाजी गर्जला कडा चढूनीया भगवा वर गाडू

घोरपडी सत्वरे चढी दोर ने वरी हा शिव आदेश
गड्यानो चढा गडाला भिडा खटाला तोडा जिंकण्या देश
मर्हाटी बाणा मारा अन हाणा घेण्या कोंढाणा आज संग्रामी 
आपली आण भगव्याची शान राखण्या मान येऊ या कामी 

चला मोगली मनसुब्यांस खिंडार आता पाडू
तान्हाजी गर्जला कडा चढूनीया भगवा वर गाडू बाजी©

Wednesday, 23 September 2020

अजीजनबाई

आजीजन 

चाळ हुंकारे रण शृंगारे श्री स्वतंत्र्यतेच्या रागावर
अजीजन ज्वाला गेली चमकून सत्तावनच्या यागावर 

ठिकाण- बिठूर (कानपूर )
दिनांक- १७ अॉगस्ट १८५७

सांग तात्त्या आणी नाना साहेब कुठे आहेत ? 

 प्रचंड रागावलेल्या इंग्रज शिपायाने एका बेड्या ठोकलेल्या बाईच्या मानगुटीला धरुन दरडावून विचारले
 
 पण  कण्हण्याच्या अवाजा व्यतिरिक्त काही ही प्रतिसाद आला नाही
 काही क्षण गेले
मग शिपाई चिडला ,
अत्यंत क्रोधित होऊन मागे सरकला 
आणी सरररररकन कमरेचा पट्टा काढून जमिनीवर आपटला 
आपटला तसा एक 
फट्ट असा अवाज तंबूत घुमला 
अवाजासोबत तीने हालचाल केली 
 अंग आकसून घेतले अर्धनग्न असून ही पाठमोरी झाली पण बोलली नाही 
 ते पाहून शिपायाची तळपायाची आग मस्तकात गेली 
हे बघ रंडे 
आता जर सांगितलं नाहीस तर तुझी गोरी चमडी पट्याने उधडून काढेन 
शिपायाचा अवाज तंबूबाहेरच्या कोलाहलात ही वीज कडकावी तसा कडकला 
आणि एक क्षण निशब्द गेला ..
ती स्त्री निर्ढावलेल्या गुन्हेगारासारखी उभी होती ,
अंग चोरुन अगदी केस अगदीच विस्कटलेले होते 
अंगावरील कपडे , कपडे म्हणून उरलेच नव्हते उरला होता नशिबासारखाच फाटका चिरुटा ,
 दिवसभरापासून चाललेल्या अत्याचारामुळे थरथरणार्या अंगावर जागोजागी जखमा झालेल्या होत्या ,
त्यात भर म्हणून कि काय तंबूतील गर्मीने घाम अंगावर मावत नव्हता 
आणी तसाच भळभळणार्या जखमांमध्ये जाऊन झिरपत होता 
जणु काय जखमावर नशिबचं मिठ चोळत होते 
तशी ती विव्हळत होती 
विव्हळत होती पण डगमगत नव्हती .
एक क्षण गेला आणी ती गरजली 

चमडी उधडली तरी सहन करेन पण  ईमान विकणार 
हसत हसत मरण स्विकारेन पण नाही मी गुलाम होणार नाही

हे ऐकून शिपाई आणखी चवताळला
एक पाऊल मागे गेला आणी दातओठ खात
हवे हात उंचावत
सपकन एक फटका तीच्या पाठिवर मारला 
मारला असा जीवाच्या आकांताने
 ती ओरडली , तडफडली 
 डोळे बाहेर आल्यासारखे वाटलं 
पाठिवरील कातडी उधडली गेली...

पैशासाठी शरीर विकणारी माझ्या सारख्या शिपायाला  गुलाम म्हणते काय ?
वेश्येने ईमानाच्या गोष्टी करायच्या नसतात !
      शिपाई ओरडला
पट्याच्या फटक्याहून अधिक काळीज चिरत गेले ते शब्द
वेश्येने ईमानाच्या गोष्टी करायच्या नसतात !
हा वार तिच्या शरीरावर नव्हता आत्म्यावर होता
तिच्या चरित्रावर होता , स्वाभिमानावर होता !

माणसात शारीरिक आघात सहन करण्याची शक्ती असते पण माणूस कधीच त्याच्या 
चरित्रावर ,स्वाभिमानावर झालेला आघात सहन करु शकत नाही 
परंतु बोलण्यासाठी अंगात त्राण उरलेला नव्हता 
तरी ही ती बोलली ,
तोंडातल्या तोंडातच ते ही 
ती म्हणाली 
मी दूर्दैवाने आणी परिस्थितीने वेश्या झाले 
चरितार्थासाठी शरीर विकले 
पण तुमच्या सारखी शरीर आणी आत्म्यासह परकियांची गुलामी केली नाही ...
 कि माझा स्वाभिमान पैशासाठी इंग्रजांच्या पायावर वाहिला नाही
 
 तीने बोलताना मोठा श्वास घेतला ..आता तिचा अवाज कापरा झाला होता तरी ही उसनं आवसान आणून ती पुढे बोलू लागली
 
 
माझे पाय मैफिल रंगविण्यासाठी थिरकले जरुर पण
हात कधी आपल्याच देशबांधवांच्या रक्ताने आपली मातृभूमी रंगविण्यासाठी उठले नाहीत
म्हणून ....तिचा श्वास जड होत होता  
तसा तसा अवाज क्षीण होत होता तरी ती बोलत होती 

म्हणून...जे पैशासाठी शरीर मन आत्म्याने
परकियांचे गुलाम होतात..
त् त् त्यानी व व वेश्येला न नाव ठेवू न नये
कसं बसं वाक्य पुर्ण केलं आणी तिची शुद्ध हरपली 

बेशुद्ध असताना तिला फरपटत सेनापती हँवलॉक समोर नेले गेले 
त्याने डोळ्यानेच शिपायाना आज्ञा केली 
शिपायांनी घडाभर गरम उकळलेले पाणी 
तीच्या अंगावर ओतले 
स्त्री म्हणून तीच्यावर दया करायला हँवलॉक काही भारतीय नव्हता 
बेसावध अंगावर वीज पडावी किंवा मासळी पाण्याबाहेर फेकल्यावर तडफडावी त्याहुन अधिक ती तडफडत होती 
पण तिथे उभ्या असणार्या कोणालाही तिच्याबद्दल किंचित ही दया उत्पन्न होत नव्हती 
होणार तरी कशी शरीर बाटलेल्याना एक वेळ 
जाग येते पण 
आत्मा विकणार्याना कसली जाग येणार होती ते देखिल शेवटी मुर्दाड मनाचे काळे इंग्रजच ना !
खूप वेळ जीवाची तडफड चालू होती 
ओरडणे चालू होते नुसता आकांत मांडला होता
तीने पण तिथे ....
पण हँवलॉक कडे वेळ नव्हता तो खुर्चीवरुन उठला 
काही पावले चालून टाचांवर तिच्यासमोर बसला आणी तिच्या विस्कटलेल्या केसात हात घालून तिच मुंडक गच्च पकडून एक जबर झटका देत तीचे तोंड वर केले आणी विचारला
तात्या आणी नाना कुठेय सांग 
शेवटच विचारतोय ....
....ती एक शब्द ही बोलली नाही
हँवलॉक चिडला 
सांग तात्या आणी नाना कुठेय
सांगितलस तर मी तुला जीवंत सोडेन 
बोल पटकन बोल पटकन बोल

हे ऐकून तीने हँवलॉक च्या डोळ्यात आपले थरथरणारे उघडझाप होणारे डोळे घातले 
..
.आणी एक चीड तिच्या तोंडावर उमटली तसच ती रक्तबंबाळ तोंडाने पचकन हँवलॉकच्या तोंडावर थूंकली 

आकस्मात झालेल्या या प्रकाराने तो भांबावला आणी प्रचंड चिडला 
या अपमानाने तो सेनापती वेडा पिसा झाला 
तळपायाची आग मस्तकात गेली 
सरररकन मागे सरकून तो उठला 
आणी आणी
कमरेची बंदूक काढून धाड धाड दोन गोळ्या तीच्या डोक्यात मारल्या 
आणी 
bloody whore !   अशी शिवी देत एका हातातील रुमालाने तोंड पुसले  

तीची तडफड कधीच बंद झाली होती 
मृत्यू ने शेवटी तीला स्वतंत्र्य केल होतं 
पण कोण होती ती ! 
एक वेश्या ,नर्तकी की आणखी कोणी
कसलं स्वतंत्र हवं होतं तीला 
शरीराच भांडवल करणारी ती स्त्री इतकी जीवावर उदार का झाली असावी ?
प्रश्न बरेच आहेत ? 
अशा प्रश्नांची उत्तरे भूतकाळाशिवाय कोण देऊ शकतो 
भूतकाळ कोणचा भूतकाळ ? तीचा भूतकाळ कि या देशाचा भूतकाळ ?
नक्की कोणाचा भूतकाळ ?
स्वतःसाठी वर्तमान जगणार्यांचा भूतकाळ ही त्यांच्यापुरताच मर्यादीत राहत असतो 
तसा 
देशासाठी जे वर्तमान जगतात नंतर त्यांचा भूतकाळ 
हा त्या देशाचा भूतकाळ बनतो आणी 
तो भूतकाळ जीवंत असतो , अमृत असतो
हे महान सत्य आहे 

Thursday, 3 September 2020

राहू दे

सगळ्यानाच आपलंस करणे, राहू दे
दरवेळी स्पष्टीकरण देणे, राहू दे
प्रत्येक वेळी सुरुवात करणे गरजेचे नाही
दरवेळी तुच माघार घेणे, राहू दे

नेहमी खळखळून हसणे राहू दे
कोणाजवळ नेहमी दुःख वाटणे,राहू दे
कोणाला ही कायम खांदा द्यावा का बरे
कोणाचा हात पकडून चालणे राहू दे

सगळेच प्रश्न सोडवणे ,राहू दे
गैरमजाची समजूत घालणे , राहू दे
कोणाकोणाची तोंड बंद करणार
प्रत्येकाला उत्तर देणे ,राहू दे 

तुटलेल्या नात्याना क्षमतेबाहेर जोडणे ,राहू दे
ताणलेल्या नात्याना ओढून धरणे,राहू दे
नात्यासाठी नेहमीच त्याग करायची गरज नाही
नात्यासाठी छातीवर घाव सोसणे , राहू दे



बाजी©

Friday, 7 August 2020

नाते

नात्यास स्वप्ना येवढाच मी,हल्ली
भाव देतो 
नावास  तुझ्या आठवण असे,आता
नाव देतो

अंधार आणी शांतता मला जेव्हा भेटते तो
अश्रू मनाला अंतरातला नाजुक ठाव देतो

काळ्या क्षणांना गर्द अडगळी मी टाकून आता
माझ्यात मजला शोधण्यास मी थोडा वाव देतो

हवं तसं उधळता येत नाहि ते जीवन माझ म्हणतं 
लाचार गर्वाला मिशावरी ठेवत ताव देतो

माझे नका म्हणू मला करा हा उपकार आता
विश्वास तोडण्यास आज मी हवं तर घाव देतो
omkar pandav©(baaji)

Wednesday, 22 July 2020

श्रावणी

घाट ओला पाहताना,चिंब ओले भाव होई
अन सरी या श्रावणी च्या,अंतरीचा ठाव घेई

हा कड्याचा थंड वारा, गीत वेडावून गाई
इंद्र धनु ही सप्तरंगी, अंबरा फुलवून जाई

सोडवेना घाट पाणी, सरसरूनी येत आहे
धबधब्याचे आर्त रडणे, विरह भावे चालताहे

धावते ओढे जसे हे ,शुभ्र मोती गुंफलेले 
हे ढगांचे रूप जणु की, द्रव्य रूपी वाहिलेले

मलमली या हिरवळी चा ,शालू वाटे पसरलेला
दूर त्या क्षितिजांतरी की, पाचु कोणी विखुरलेला

सोनकी चे स्वर्ण उधळी, सह्य नटुनी श्रावणी या
कारवी जणु माणिकाचे, रत्न शोभे कोंदणी त्या

यौवनी स्त्री साजते तद्, श्रावणी हा सह्य शोभे
आस आम्हा डोंगराची ,का उगाची नित्य लागे ?
baaji©

Saturday, 20 June 2020

पावनखिंड

प्रचंड गर्जूनी रणी ,नर्क तया दावितो
खिंडीमधे बाजी बघा, सिद्दी आज गाडतो 

पडता टप्यात टाप  ,पट्टा भिडू लागला
सन सन बाण शत्रू मान छेदू लागला
काळ करी तरवारी,धारे वरी तोलला
लोटलेला लोट भला भाल्या वरी थोपला

शंभराला एकलाची पुरुनिया उरतो
खिंडीमधे बाजी बघा, सिद्दी आज गाडतो 

गोफणीच्या गुंडमारा खाली अरी ठेचला
पाश असा सिद्दीवरी,वरतूनी फेकला
नद आज खवळून सागरास खेटला
पाहुनी आवेश चंड सागर ही हटला

गाठूनिया खिंडीमधी, क्रूर कावा साधतो
खिंडीमधे बाजी बघा सिद्दी आज गाडतो

मराठ्याचा बाणा हर महादेव गर्जला
मारा हाणा मारा हाणा कल्लोळ हा चालला
शत्रू मास रगताने मराठा हा नटला
टिच टिच पाउलाला वीत वीत भांडला

तोफे आधी सुर्य कसा आज पाहू बुडतो
खिंडीमधे सिद्दी बघा आज कसा गाडतो


बाजी©

Sunday, 14 June 2020

बंडखोर

काळास सांगा जन्मतः मी बंडखोर आहे
नियतीस यत्ने जिंकतो तो मी मुजोर आहे

नाही असा झुकणार या काळापुढे कधीही
लढणार जिंकण्यार्थ हा मी भांडखोर आहे

होईल सारा खाक मी जाणार पीळ नाही
स्वभाव ही माझा जसा मी एक दोर आहे

स्वतंत्र आम्ही जन्मतः वार्यासमान ऐसे
ठेवील आम्हा मुठी  कोणात जोर आहे 

आली तुफाने ही किती हलणार ना जरासा
रक्तात सह्याद्री कडा झुंजार थोर आहे
बाजी© 

Friday, 5 June 2020

शिव राज्यभिषेक दिन अर्थात हिंदूसाम्राज्य दिवस

हिंदूसाम्राज्य दिवस अर्थात राज्यभिषेक  दिन

ज्या दिवशी हिंदूस्थानात  पाद आणी बादशाह्याना मर्हाटीकेसरीने आपला पंजा दाखवून रायगडावरुन गर्जना केली 
कि हे हिंदवी स्वराज्य (हिंदूंच स्वतःच राज्य)सार्वभौम आणी स्वतंत्र आहे आणी या राज्याचा भूपती विष्णू आम्ही छत्रपती रुपाने भोसले कुलदिपक शिवाजीस अभिषिक्त केले आहे 
सभासदाच्या भाषेत बोलायचे तर एक मर्हाटा पातशहा एवढा छत्रपती झाला ही गोष्ट सामान्य जाहली नाही 
महाराष्ट्रश्री ने इतिहासात दोन दैदिप्यमान स्वतंत्रोत्सव राज्यभिषेक पाहिलेले आहेत एक शालिवाहनाचा आणी दूसरा छत्रपती शिवरायांचा 
 भरतखंडावर एखाद्या प्रांताने दोन शक संवत्सर कर्ते महापुरुष द्यावे हि घटना इतिहासात एकमेव आहे.
 हिंदूसाम्राज्य दिवस यासाठी कि पृथ्वीराज चौहान पासून विजयनगर साम्राज्यापर्यंत ईस्लामी सत्तेविरुद्ध हिंदूंच्या पराजयाची मालिका संपली होती आणी
 मुसलमान अजेय आहेत हि मानसिकता पुर्णपणे नाहिशी होऊन भारतभर हिंदूंना यातून स्वराज्य निर्माण करण्याची प्रेरणा मिळाली होती याच ज्वलंत उदाहरण छत्रसाल बुंदेला आहे 
 ज्या बादशहापुढे हिंदू सामंत,सरदार नजरा वर करु धजत नव्हते ते करारीपणाने उत्तरे देऊ लागले उदाहरण लछित बडफुकन हा आसामचा प्रतिशिवाजी आहे
 हा राज्यभिषेक केवळ आणी केवळ एका व्यक्तीचा नव्हता आणी राज्यभिषेक लौकिकानै कधी वैयक्तिक नसतो देखिल 
 हा राज्यभिषेक होता 
देव देश आणी धर्म यासाठी मरुन शिवराय या परमात्म्यात समावालेल्या प्रत्येक मावळ्यांच्या घोड्यांच्या हत्तींच्या आत्म्यांचा .
हा राज्यभिषेक होता लोकांचा 
ज्यांनी या राजावर जीव ओवाळून टाकला होता त्या सर्व लोकांचा 
हा राज्यभिषेक होता तीनशे वर्ष गुलामी सहन करणार्या महाराष्ट्र श्री चा 
हा राज्यभिषेक होता विश्वासाचा कि यापूढे 
कोणतं देऊळ पाडल जाणार नाही मुर्ती फोडली जाणार नाही 
कोणाचं घरदार शेत माळ जाळलं जाणार नाही
कोणाचे बायकापोर लुटले नासवले विकले किंवा मारले जाणार नाहीत
हा राज्यभिषेक होता हक्काचा 
हक्काच्या जागेचा जिथे लोकाना निष्पक्ष न्याय मागण्याचा हक्क मिळणार होता 
हा राज्यभिषेक होता कर्तव्याचा 
या भूमीसाठी ज्या ही विरांनी रक्त सांडले त्याच बलिदान व्यर्थ न जाऊ देता प्राणपणाने 
याच रक्षण करण्याच्या कर्तव्याचा
हा राज्यभिषेक होता हिंदूंच्या स्वप्नांचा 
अनादी काळापासूनच्या आमच्या मातृभूमीला
आमच्या पवित्र तीर्थाना ,दैवताना आमच्या पवित्र नद्याना आमच्या पवित्र संस्कृतीला परदास्याच्या कट्यारीखालून मुक्त करण्याचा 
आणी रायगडावरुन समस्त नरपशूंना धमकावण्याचा कि 
या राजा शिवछत्रपती ची तलवार दक्षिणेची ढाल आहे 
हिंदूंसाठी रक्षक भिंत आहे आणीधर्मवेड्या ईस्लामी सत्तेस काळ रुप आहे

तेज तरवार भयो, दख्खनकी ढाल भयो,
हिंदुकी दिवार भयो, काल तुरकानको 
 


 baaji©
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Wednesday, 27 May 2020

साजी चतुरंग वीर रंग मे तुरंग चढी

महाकवी भूषणाचा शिवरायांच्या सैन्य संचलनावरचा अप्रतिम आणी माझा सर्वाधिक आवडता  छंद त्याचा मी केलेला त्याच छंदातील पद्यानुवादाचा प्रयत्न .


साजि चतुरंग बीररंग में तुरंग चढ़ि।
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है॥
भूषन भनत नाद विहद नगारन के।
नदी नद मद गैबरन के रलत हैं॥
ऐल फैल खैल भैल खलक में गैल गैल,
गाजन की ठेल-पेल सैल उसलत है।
तारा सों तरनि घूरि धरा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है

छंद -कवित्त मनहरण , ३१ वार्णिक छंद ज्यात १६,१५ यती आहे
अलंकार -अनुप्रास (वृत्यानुप्रास)

पद्यानुवाद -

सज्ज चतुरंग वीर रंगात तुरंगारुढी
सर्जा शिवाजी जंग जिंकण्या चालतो आहे
भूषण म्हणतो नाद विहद नागार्याचा 
नदी सम मद हत्तींतून वाहतो आहे
गर्दी फैले कोलाहले खळबळ माजलेली
हत्तींच्या मत्त चाले सैल उसळत आहे 
चंड चाले धूळी मुळे ताराची तरनी जणु
थाळी हले पारा तशी धरा हलते आहे
बाजी© 

अर्थ-
सजुन धजुन दिमाखदार अश्वारुढ सेना घेऊन सर्वशिरोमनी (सरेजाह)
शिवाजी युद्ध जिंकण्याकरिता निघालेला आहे 
भुषण म्हणतो नगार्याचा अवाज मोठमोठ्याने होत आहे
मत्त हत्तींच्या मतिष्कातुन मदप्रवाह नदीसारखा वाहत आहे
रस्त्याने कोलाहल करित चाललेल्या सैन्यामुळे सगळीकडे खळबळ
माजलेली दिसते
महाकाय हत्तीदलापुढे पर्वत पर्वतासन देखील उखडले जात आहेत
शिवाजीच्या प्रबळ सेनेमुळे असमंतात उठलेल्या धुळीने सुर्य ही झाकला आहे
तसेच या प्रचंड सेनेच्या चालण्याने समुद्र पर्वत  देखील हलत आहेत

बाजी© 
omkarpandav.blogspot.com

Saturday, 16 May 2020

मराठवाडा

शौर्य धैर्य अन भक्तीचा ,अखंड अमृत ओढा 
मराठीचे हृदय विहंगम ,आपला मराठवाडा

बीड जालना हिंगोली लातुर अन परभणी 
नांदेड धाराशिव आहे औरंगाबाद राजधानी 

सहस्त्रकुंड सौताडा शैवभूमी कपिलधार प्रपात
गौताळा रामलिंग नायगाव माहुरचे अरण्य घनदाट

गोदावरी माय मांजरा,बिंदुसरा इथे वाहती
पुर्णा पैनगंगा सिंदफणा,मराठवाडा फुलविती

तूर मुग उडीद मटक्यांनी टाच कणग्या भरती
तीळ ,मोहरी, कार्हळे ,जवसाची पिके डोलती 

काळ्या मातीची सुपीकता आम्ही वर्णावी किती
गहु बाजरी ज्वारी रुपाने पिकतात इथे मोती 

दुष्काळाने हतबल होतो लढणे सोडत नाही
मातीची या साथ आम्हाला कधी सोडवत नाही

सातवाहन पराक्रमी ,राष्ट्रकुटांचे मुळ
यादवांची देवनगरी, इथलेच भोसले कुळ

चालुक्यीय कंधार मोठा उदगीर परांडा विकट
रमणीय नळदुर्ग मोठा भयंकर धारुर कोट 

वसई भांगसी अंतुर आणी सुतांडा उपकोट
मध्य भागी राजधानी उभा देवगिरी चखोट

शिवशंकराचे स्थान येथे परळी वेरुळ औंढा
श्री रेणूका ,तुळजाई कुलदैवी सकलाची अंबा

श्रीगुरु सचखंड तख्त महद्तीर्थ शिखांचे
कचनेर जटवाडा कुंथलगिरी तीर्थ पवित्र जैनांचे

इथेच अवतरला कृष्ण ज्ञानेश्वरांच्या रुपाने
नाथा घरी वाहीले पाणी भगवान श्रीखंड्याने

महद्भक्त नामदेवा हातचा घास खाई पांडुरंग 
रामदास समर्थ कलीयुगीचा अवतार हनुमंत

विविधतेत एकतेला येथे वेरुळास कोरले
शांतीरुप अजिंठा लेणे मराठवाड्यात घडले

दख्खनी ताज उभा येथे, हेमाडपंती मंदिरे खास
चैत्य विहारांची नांदी जणु विश्वकर्म्याचा निवास

हाल राजाची सप्तशती महाराष्ट्रीचा आद्यग्रंथ
मुकूंदाच्या विवेकसिंधूत वाहतो मराठी गंध

पैठणीचा दिमाख भारी अजून जगी साजतो
शाही हिमरु शालू इथला सर्वानाच भावतो 

भाजी भाकरी  प्रिय  सोबती कांदा ठेचा थोडा
भाषेने तिखट बोलीने गोड आपला मराठवाडा

बाजी© 

पानिपत काव्य

प्रलयलोटला सागर उठला  खणाणल्या समशेरी महाभारतासम रण दिसले कुरुक्षेत्राची भुमी भाऊ सदाशिव रणात तांडव काळाग्निसम करीत भिडले शिंद्याचे रण भैरव ...